राधिका की डायरी: ममता की परीक्षा, अनहोनी का डर और एक माँ का अनकहा दर्द
राधिका की डायरी: ममता की परीक्षा, अनहोनी का डर और एक माँ का अनकहा दर्द बेटे के चले जाने के बाद, मैं कुछ देर के लिए अकेली बैठी रही। मन में एक अजीब सी हलचल और साथ ही एक गहरा संतोष भी महसूस हो रहा था। चलो, आखिरकार एक हफ़्ता गुज़र ही गया था। बाइक पूरी तरह सुधरकर वापस आ गई थी और बेटे ने दोबारा अपनी डिलीवरी बॉय की नौकरी भी शुरू कर दी थी। मेरे लिए सबसे बड़ी राहत और सुकून की बात यह थी कि मैंने अपनी तरफ से उस बाइक की पहली किस्त भी पूरी तरह चुका दी थी। रोज़मर्रा के घरेलू खर्चों को लेकर फिलहाल कोई बड़ी दिक्कत या आर्थिक तंगी सामने नहीं थी, यह सोचकर मेरे व्याकुल मन को थोड़ी तसल्ली मिली। तभी अचानक मेरी सोच का रुख मेरी प्यारी बेटी 'खुशी' की तरफ मुड़ गया। पिछले कुछ समय से उसके सालाना पेपर चल रहे थे। मैंने मन ही मन अंदाज़ा लगाया कि अब तक तो उसके सारे एग्जाम खत्म हो चुके होंगे। अब मुझे उसे वापस घर लाने के लिए लेने भी जाना था। मेरी बेटी अपनी बुआ के साथ रहती थी और वह हर साल गर्मियों की छुट्टियों में ही हमारे पास यहाँ आया करती थी। मैंने सोचा कि चलो अब समय हो गया है, उसे बुला लेती हूँ। लेकिन ...